ब्रजबाला-2. व्याकुल मन
संजीवनी के प्रथम खण्ड ब्रजबाला का यह द्वितीय भाग ,जिसमे श्री राधा को किसी अनहोनी का भय सताता है और श्री कृष्ण की कुशल-मंगल की कामना करती है उसका मन व्याकुल है , इसमे श्री राधा -ललिता (सखी) संवाद है व्याकुल मन राधा - व्याकुल आज मेरा मन क्यों ? क्यों चैन कहीं नहीं पाता है ? तड़प-तड़प कर हृदय यह, जैसे बाहर को आता है। हैं फरक रहे दाहिने अंग क्यों ? अमंगल संकेत कराते हैं। यह नेत्र मेरे अश्रु जल से, क्यों बार-बार भर जाते हैं ? मेरा रोम-रोम क्यों काँप रहा ? ज्वाला हृदय में धधक रही। दर्शन की प्यासी यह आँखें, क्यों बार-बार यों छलक रहीं ? कहीं फिर न हों संकट में प्रियतम, यह बार-बार दिल गाता है। हे गौरी माँ हो रक्षक तुम, तू जग-जननी शक्ति माता है। हे शिव शंकर तुम सदा शिव हो, कुछ मेरा भी कल्याण करो। कान्हा का बाल न बाँका हो, चाहे मेरे ही तुम प्राण हरो। हे ब्रह्म सुनो सृष्टि करता, हे भाग्य विधाता दुख हरता। अपना यह नाम साकार करो, मेरे प्राण-प्रिय का उद्धार करो। हे गणपति बाबा जागञानदन, करती हूँ तेरा अभिनंदन। देखो यह मेरा करुण रुदन, जल्दी काटो हमरे बंधन। हे राम भक्त बजरंग बली, देखो अब मेरी जान चली।...