ब्रजबाला -5 राधा-कृष्ण संवाद
संजीवनी के प्रथम खण्ड ब्रजबाला भाग ५ मे श्री राधा-कृष्ण संवाद और अमर प्रेम का वर्णन है राधा-कृष्ण संवाद सुनी देवो की जो करुण पुकार हुई कृष्ण की दृष्टि भी अपार जब देखी उग्र रूप राधा कान्हा ने यह निर्णय साधा किसी तरह राधा को मनाऊँ मैं अपना स्वरूप बताऊँ मैं कान्हा ने मन में विचार किया चतुर्भुज रूप साकार किया राधा ने देखा जो सम्मुख कान्हा को देख के हुई चकित गिर कर के राधा चरणों पर रो-रो कर कहती, हे नटवर राधा की सौंगंध है तुमको मथुरा न जाओ तजकर हमको बिन तेरे जी न पाएँगे तुम्हे बिन देखे मर जाएँगे अधूरी है तुम बिन यह राधा इस लिए मैंने निर्णय साधा जो मधुपुरी को तुम जाओगे जिंदा न मुझे फिर पाओगे मैं प्राण त्याग दूँगी कान्हा रहेगा तुम पर यह उलाहना इक प्रेम दीवानी मौन हुई कहो प्रेम में ग़लती कौन हुई? गिरा ब्रजरानी का अश्रुजल धुल गये कान्हा के चरण-कमल हाथों से उसे उठाते हैं फिर प्यार से गले लगाते हैं राधा के पोंछते हुए नयन बोले कान्हा यह मधुर वचन तुम क्यों अधीर हो रही प्रिय अब ध्यान से मेरी सुनो विनय तुम प्रेम की देवी हो राधे सब प्रेम से ही कारज साधे फिर रूठी है क्यों मेरी प्रिया कहो, तुम बिन मैंने...