भूमिका

दो-शब्द:-भाषा भावों की वाहिका होती है। अपनी काव्य पुस्तक "सञ्जीवनी" में भाषा के माध्यम से एक लघु प्रयास किया है उन भावों को व्यक्त करने का जो कभी हमें खुशी प्रदान करते हैं, तो कभी ग़म। कभी हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं और हम अपने आप को असहाय सा महसूस करते हैं। सञ्जीवनी तीन काव्य-खण्डों का समूह है - 1.ब्रजबाला , 2.कृष्ण-सुदामा ,3.कृष्ण- गोपी प्रेम प्रथम खण्ड-काव्य "ब्रजबाला" मे श्री-राधा-कृष्ण के अमर प्रेम और श्री राधा जी की पीडा को व्यक्त करने का, दूसरे खण्ड-काव्य "कृष्ण-सुदामा" मे श्री-कृष्ण और सुदामा की मैत्री मे सुखद मिलन तथा तीसरे खण्ड-काव्य "कृष्ण - गोपी प्रेम" में श्री कृष्ण और गोपियों के प्रेम के को समझने का अति-लघु प्रयास किया है। साहित्य-कुंज मे यह ई-पुस्तक प्रकाशित है आशा करती हूँ पाठकों को मेरा यह लघु प्रयास अवश्य पसंद आएगा। — सीमा सचदेव

सोमवार, 22 मार्च 2010

गोपी -उद्धो संवाद

दूर से देखा रथ आता
ब्रज वालों का ठनका माथा
लगा कान्हा आ रहा आज वहाँ
हो गये इक्ट्ठे थे जहाँ तहाँ
रथ देख के आगे भाग पड़े
लगा भाग्य हैं उनके जाग पड़े
कान्हा से मिलने की इतनी लगन
उस तरफ था भगा हर इक जन
पास से देखा तो चकित हुए
यह तो अपना कान्हा है नहीँ
यह तो कोई और ही है रथ पर
क्यों आया है वो इस पथ पर?
उद्धो , रुका पास में आकर
बुलाया नंद बाबा को जाकर
उनको अपना परिचय करवाते
कान्हा का संदेस सुनाते
वो चुपचाप ही सुन रहे थे
सुन कर कुछ भी न बोले थे
न खुशी न गम ही जतलाया
थोड़ा उद्धो का मन भर आया
देखी जो उसने माँ जसुदा
उद्धो का मन भी भर गया था
देखी जो राधा की सूरत
वो लगी थी पत्थर की मूरत
साहस नहीँ वह कुछ जाके कहे
वह क्या कहे? और कैसे कहे?
देखी थी पास खड़ी सखियाँ
पत्थर थी उनकी भी अखियाँ
जाकर के पास कुछ न बोला
बस कान्हा का पत्तर खोला
कान्हा ने दिया, बस यही कहा
फिर होश किसी को नहीँ रहा
कान्हा ने भेजी यह पाती
छीना और लगा लिया छाती
सब उस पाती को खोने लगी
और आँसुओं से उसे ढोने लगी
उस कागद पर आँसू जो पड़े
पाती के अक्षर सभी धूल गये
स्याम स्याही में अश्रु मिलकर
हो गई पाती भी स्याम धूलकर
उस कागद को ही चूम रहीं
धन्य स्वयं को जान रहीं
बिन बोले सब कुछ कह ही दिया
उद्धो का अहम तो गिर ही गया
बस देख के ही हो गया आधा
और ज्ञान में आने लगी बाधा
खुद को पाया था बहुत छोटा
उनके सम्मुख सिक्का खोटा
यह प्रेम तो था स्व- पर से परे
वह धन्य जो ऐसा प्रेम करे
इस प्रेम की न कोई है सीमा
सच्च ही कहता था मुझे कृष्णा
अब इनके पास जाऊँ कैसे?
और इनको मैं समझाऊँ कैसे?
नहीँ शब्द हैं कोई मेरे पास
यह सोच के थोड़ा हुआ उदास
पर इनको तो समझाना है
मुझे कान्हा को भी तो बताना है
इस प्रेम को छोड़ के अब इनको
ज्ञान के मार्ग पे जाना है
अभी तक उद्धो ने न जाना
क्या प्रेम है? यह न पहिचाना
अभी भी तो अहम है समाया
और पास गोपियों के है आया
कहा, ध्यान से मेरा सुनो कहना
अब पीड़ा में नहीँ तुम रहना
अब प्रेम न तुमको सताएगा
इस तरह से नहीँ रुलाएगा
ध्यान धरो ब्रह्म का ऐसे
वन में कोई योगी हो जैसे
उस निराकार का ध्यान धरो
और बैठी स्माधि में ही रहो
फिर दशों-द्वार खुल जाएँगे
तुम्हें पूरण ब्रह्म मिल जाएँगे
उस का कोई रूप न रंग ऐसा
तुम्हारे कान्हा के प्रेम जैसा
कान्हा तो है सामान्य जन
जिसमें डूबा है तुम्हारा मन
वह मन जो ब्रह्मा को देदो
बदले में अमूल्य ज्ञान ले लो
जो ज्ञान तुम्हें आ जाएगा
फिर नहीँ प्रेम रह जाएगा
फिर तुम जीवन जी पायोगी
जो कान्हा को तुम भुलायोगी
कान्हा ने भेजा है मुझको
और कहला भेजा है तुमको
उसे भूल जाओ अच्छा होगा
और ज्ञान में ही फ़ायदा होगा

अब तक गोपियाँ जो सुन थी रहीं
अब बोले बिना वो नहीँ रहीं
कान्हा ने भेजा है तुमको....?
ब्रह्म ज्ञान देने हमको.............
न न तुमसे है भूल हुई
अवश्य तुमसे कोई चूक हुई
उसको तो तुम नहीँ जानते हो
ज्ञानी हो ! नहीँ पहिचानते हो
तुमको ही सिखाने भेजा है
कान्हा ने यह तुमसे छल किया है
बोलो जब तुमको भेजा था
क्या कान्हा तनिक मुस्काया था?
तुम कहाँ के ऐसे हो ज्ञानी?
कान्हा की शरारत न जानी
और कौन सा तेरा यह ब्रह्म है?
जो केवल मन का ही भ्रम है
क्या देखा है तुमने ब्रह्म को?
जो दूर करे तेरे तम को
क्या वह कान्हा सा प्यारा है?
क्या उसने कंस को मारा है?
क्या उसने देखा है वृंदावन?
क्या कभी उठाया गोवर्धन?
क्या वह भी माखन खाता है?
कान्हा सी मुरली बजाता है
क्या रहता है यमुना तीरे
और खेल करे धीरे-धीरे
उसकी मुरली की मधुर धुन
क्या ज्ञान से तुम सकते हो सुन?
वह ब्रह्म दिखने में कैसा है?
क्या वो कान्हा के जैसा है?
क्या पहनता है वह पीत वस्त्र?
क्या मुरली है उसका अस्त्र?

उद्धो तो बस चुप हो ही गया
और ज्ञान कहीं पर खो ही गया
नही रहे उसके पास कोई शब्द
हो गई उद्धो की ज़ुबान बंद
गोपियाँ तो बस अब बोल रहीं
और भेद प्रेम के खोल रहीं
उद्धो उस प्रेम में डूब रहा
कान्हा का विचार क्या खूब रहा
अब गोपियाँ कहाँ मानने वाली
वह तो बस प्रेम जानने वाली
बोलो तुम भी क्या चाहोगे?
कड़वा रस या मधु खायोगे?
कड़वा रस ब्रह्म, मधु है कृष्ण
बोलो कहाँ मानेगा तेरा मन
जो ध्यान स्माधि लगाओगे
क्या संभव ब्रह्म को पाओगे?
कान्हा से प्रेम करोगे तो
उसे हरदम साथ ही पाओगे
वह साथ ही रहता है अपने
नहीँ देखते हम झूठे सपने
तुम्हे पता है ब्रह्म कहाँ रहता है?
और क्या-क्या काम वो करता है?
बोलो वो ब्रह्म क्या खाता है?
क्या वह भी रास रचाता है?
कान्हा तो दिल में रहता है
सारे ही काम वो करता है
वह माखन मिस्री खाता है
हमारे संग रास रचाता है
वह गायों को भी चराता है
और सबको संग में नचाता है
यमुना किनारा जाकर वह
फिर मुरली मधुर बजाता है


और तुमने यह क्या कहा उद्धो
इक मन है वह ब्रह्म को देदो
उद्धो, यहाँ केवल नहीँ मन है
यहा रोम रोम में मोहन है
अब तो केवल एक ही मन है
उसमें बस गया मन मोहन है
हमारे जो अनेक मन भी होते
तो भी उस ब्रह्म को न देते
हम गाँव वाले भोले-भाले
हम नहीँ समझें तेरे चाले
व्योपारी बन कर आए हो
और आकर हमें बताए हो
यह योग व्योपार करो हमसे
कान्हा को दूर करो मन से
न, न ऐसा नहीँ हो सकता
यहाँ यह व्योपार न फल सकता
जाओ तुम और जहाँ चाहो
यह योग ज्ञान तुम ही पाओ
हम को तो इससे मुक्त रखो
यह योग- ज्ञान तुम ही परखो
हमारे तो गिरधर केवल
वो ही देता है हमको बल
जाओ तुम फिर यहाँ न आना
यह ज्ञान कान्हा को सुना देना
यहाँ नहीँ हम कोई चेरी
जो मान जाए बातें तेरी
किसी और को जाके सुना देना
अपना व्यापार बढ़ा लेना

अब तो उद्धो बस टूट गया
और उसका ज्ञान भी फूट गया
समझा वह कृष्ण की अब लीला
वह प्रेम के आगे पड़ा ढीला
चरणों में उनके गिर ही गया
बोला मुझसे अपराध हुआ
क्षमा करो मुझको तुम सब
आ गया है मेरी समझ में अब
प्रेम से उत्तम कुछ भी नहीँ
क्यों कान्हा ने मुझसे नहीँ कही?
हाँ! मैने ही नहीँ सुना उसको
इस लिए भेजा है ब्रज मुझको
निर्गुन का ज्ञान तो मिट ही गया
और प्रेम के हाथों लुट ही गया
अब वह हुआ प्रेम का दीवाना
प्रेम उत्तम है उसने माना

जाके वह कृष्ण को बता रहा
गोपियों की बात सुना ही रहा
तुम बड़े निष्ठुर हो कान्हा
इतना है तुमसे उलाहना
क्यों छोड़ दिया तुमने ब्रज को?
है नमस्कार जिसकी रज को
जहाँ पर तुमने है पैर धरा
वह हर पग तो तीरथ है बना
क्या ब्रज गोपियों का प्रेम अमर?
क्या तुम पर ज़रा भी नहीँ असर?
न तड़पाओ तुम उनको ऐसे
उन बिन रहते हो तुम कैसे?

तुम क्या जानो? कान्हा बोले
अच्छा भाग्य, जो ब्रज का हो ले
वह भिन्न नहीँ मुझसे कोई
मेरी खुशी तो ब्रज में खोई
मैं ब्रज को नहीँ भुला सकता
मजबूरी वहाँ नहीँ जा सकता
उस प्रेम को मैं भूल जाऊँ कैसे?
क्या मन में है? तुमको बताऊँ कैसे?
कान्हा गोपियाँ, गोपियाँ कान्हा
फिर कैसा हमारा उलाहना
दिल से कभी दूर नहीँ होंगे
चाहे दुनिया में कहीं भी रहेंगे
यह गोपी कृष्ण का प्रेम अमर
बस समझे इसको मन मंदिर
हर बात में लीला दिखाता है
जाने क्या-क्या करवाता है?

5 टिप्‍पणियां:

भूतनाथ ने कहा…

waah......lazawaab......sundar....

Dr. shyam gupta ने कहा…

अति सुन्दर.

indu puri ने कहा…

आश्चर्य! इतनी प्यारी रचायें
क्या और कैसे बतलाये ?
मन मोहन मन में समाने लगे
कभी गोपी,कभी राधे खुद में पाने लगे
कालिंदी,वट वृक्ष की छैयां में
मैं मिलती थी अपने कन्हैया से
झगडी जब उद्धो आये समझाने थे
गुस्से में दिए खूब मैंने उन्हें जी भर कर ताने थे
रीबावरी कैसे भूल गई उनको
धन्य भाग मेरे जो मिली तुमसे
तुमने भूली बाते जो दोहराई
जैसे भटक रही थी लौट आई
बहे अविरल आंसू मेरी आँखों से
जो विश्वास न हो पूछो मेरे कान्हा से
सखे !क्या तुम ही तब उद्धो थे
मैं ही थी क्या राधेरानी?
ए जोग गुरु! मुझे छमा करो
उस जन्म मे भी अज्ञानी थी
इस जन्म मे भी रही मैं अज्ञानी
बस प्रीत के गीत सिखा गाना
इस जग ने न पहले माना
इस जग ने न अब माना.
भली करे मेरे कान्हा तुम्हारी सगली
पर मैं न तब बदली,न अब बदली

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रोचक , प्रशंसनीय ।

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…


सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं