भूमिका

दो-शब्द:-भाषा भावों की वाहिका होती है। अपनी काव्य पुस्तक "सञ्जीवनी" में भाषा के माध्यम से एक लघु प्रयास किया है उन भावों को व्यक्त करने का जो कभी हमें खुशी प्रदान करते हैं, तो कभी ग़म। कभी हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं और हम अपने आप को असहाय सा महसूस करते हैं। सञ्जीवनी तीन काव्य-खण्डों का समूह है - 1.ब्रजबाला , 2.कृष्ण-सुदामा ,3.कृष्ण- गोपी प्रेम प्रथम खण्ड-काव्य "ब्रजबाला" मे श्री-राधा-कृष्ण के अमर प्रेम और श्री राधा जी की पीडा को व्यक्त करने का, दूसरे खण्ड-काव्य "कृष्ण-सुदामा" मे श्री-कृष्ण और सुदामा की मैत्री मे सुखद मिलन तथा तीसरे खण्ड-काव्य "कृष्ण - गोपी प्रेम" में श्री कृष्ण और गोपियों के प्रेम के को समझने का अति-लघु प्रयास किया है। साहित्य-कुंज मे यह ई-पुस्तक प्रकाशित है आशा करती हूँ पाठकों को मेरा यह लघु प्रयास अवश्य पसंद आएगा। — सीमा सचदेव

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

ब्रजबाला-3. शक्ति स्वरूपिणी राधा

ब्रजबाला भाग तीन शक्ति स्वरूपिणी राधा मे श्री राधा जी की अद्भुत शक्ति और श्री कृष्ण जी के प्रति उनका अनन्य प्रेम व्यक्त किया है जब श्री राधा जी को ( द्वित्तीय भाग-व्याकुल मन ) पता चलता है कि श्री कृष्ण जी माता यशोदा के पुत्र नही है ,वो मथुरा जाने वाले हैं और वहां पर कंस श्री कृष्ण संग
युद्ध करने वाला है तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठती है इस भाग मे उसी का वर्णन है

शक्ति स्वरूपिणी राधा


सुनो ब्रह्मा विष्णु औ महेश
गंधर्व मुनि किन्नर औ शेष
हे गौरी चन्डी काली शक्ति,
की मैंने जो जीवन में भक्ति
उस बल पर मैं पुकारती हूँ
रिपु कंस को मैं ललकारती हूँ
कान्हा से प्रेम किया है तो
जीवन भर उसे निभाऊँगी
प्रण करती हूँ यह कंस को मैं
मारूँगी या मार जाऊँगी
कान्हा जो नहीं रह पाएगा
सृष्टि में न कोई बच पाएगा
मैं भयंकर प्रलय मचा दूँगी
दुनिया को कर स्वाह दूँगी
राधा ने ये जो शब्द बोले
शिवजी ने तीन नेत्र खोले
सृष्टि में हाहाकार हुआ
भयभीत सारा संसार हुआ
तूफान उठे बिजली कड़की
जलधारा उल्टी बह निकली
त्रिलोक में हुआ कंपन
भयभीत हुए सब देवतगन
शिवजी से करने लगे पुकार
सृष्टि का कहीं न हो संहार
हे ब्रह्म पिता सृष्टि पालक
रक्षा करो सृष्टि की मालिक
हे विष्णु जग पालन करता
हे करुणा निधि हे दुख हरता
अपना यह रूप साकार करो
त्रिलोक का उद्धार करो
सब लगे सोचने देवतगन
गंधर्व मुनि नर औ किन्नर
साधारण नहीं है ये नारी
सृष्टि जिसके सम्मुख हारी
इस सृष्टि का विनाश होगा
ब्रह्मा के सृजन का नाश होगा
कोई भी नहीं बच पाएगा
केवल शून्य रह जाएगा
रोका नहीं तो अनुचित होगा
संहार रोकना उचित होगा
किसकी हिम्मत जो जा के कहे
माँ धैर्य धरे और शांत रहे
हैं कृष्ण नहीं साधारण जन
फिर क्यों अस्थिर है माँ का मन
माँ से ही तो जग पलता है
उसको विनाश कब फलता है
गिरधर तो सब का प्यारा है
वह कहाँ किसी से हारा है
क्या कंस कृष्ण का बिगाड़ेगा
निश्चय ही अह्‌म वश हारेगा
क्या भूल गई हैं ब्रजरानी
श्री कृष्ण की इतनी कुर्बानी
मुरली की सुन के मधुर धुन
हो जाते हैं त्रिलोक मगन
गिरिराज उठा जो सकता है
कौन उसके सम्मुख टिकता है
सेवा में जिसकी शेषनाग
पी थी जिसने दो बार आग
विष का जिस पर न प्रभाव हुआ
उल्टे दुष्ट का उद्धार किया
जिसने इतने दानव तारे
भेजे जो कंस ने वो सब मारे
भ्रम ब्रज वालों का दूर किया
अभिमान इंदर का चूर किया
नाथ कर के शेषनाग काला
विष मुक्त यमुना को कर डाला
गया माया का प्रभाव फैल
टूटे ताले खुल गई जेल
मथुरा से आ गये गोकुल
हुई न ज़रा सी भी हलचल
नारायण हैं वे श्री कृष्ण
जागपालक हैं वे श्री कृष्ण
दुख हरते हैं वे श्री कृष्ण
सुख करते हैं वे श्री कृष्ण
शिव, ब्रह्मा, विष्णु विचार करें
श्री कृष्ण की क्यों न पुकार करें
यह लीला उनकी वही जानें
श्री कृष्ण से ही राधा माने
जगजननी माँ श्री राधा को
श्री कृष्ण ही सबसे प्यारे हैं
लीलाधारी की लीला के
खेल अदभुत और न्यारे हैं
सब देवता श्याम स्तुति गाते
कर के पद कमलों की सेवा
श्री कृष्ण गोविंद हारे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव

1 टिप्पणी:

'Yuva' ने कहा…

''स्वामी विवेकानंद जयंती'' और ''युवा दिवस'' पर ''युवा'' की तरफ से आप सभी शुभचिंतकों को बधाई. बस यूँ ही लेखनी को धार देकर अपनी रचनाशीलता में अभिवृद्धि करते रहें.